Thursday, May 7, 2026

एक खत, बेटी के नाम

हालांकि मेरी भी शिकायतें हैं तुमसे,

एक अरसा हुआ तुम घर नहीं लौटी,

जो गर तुम आ जाती तो मैं तुम्हें बताता,

कि मैं भी एक पिता होने से पहले एक इंसान हूं,

यह पहली ही जिंदगी है मेरी भी,

पहली शादी, पहली बेटी, पहली नौकरी, पहला परिवार ओर भी न जाने कितने पहले अनुभव.....

जिन में मैं भी प्रयोग कर रहा था, 

जीवनरूपी इस प्रयोगशाला में,

जब तुम गलतियां करती हो, 

तो मैं तुम्हें नन्ही गुड़िया समझकर माफ कर सकता था,

मगर मैं अनजान था इस बात से कि मेरे काम और जीवन का तनाव तुम पर फूट पड़ेगा,

तुम्हें डांटकर, मैं भी खुश तो नहीं था,

पर मैं कमजोर था, 

अपने अंदर के उस शोर को सुनने में,

जिसके लिए ठहरता तो शायद तुम्हारा स्कूल, बस्ता और जूते नहीं ला पाता,

अब तुम जो आ जाती तो मैं बताता, 

कि मैं भी कितना अल्हड़ और शरारती सा था,

जब तुम्हारी मां ब्याह कर आई थी, 

फिर समाज, घर, आटा, दाल में ऐसा उलझा कि खुद को भूल गया,

मेरे सपने, मेरी शिकायतें जैसे कहीं दूर हवा में उड़ गई,

जब तुम आंगन में आई,

फिर सिर्फ तुम, आटा, दाल, घर और तुम्हारा पालन पोषण, 

मेरा सपना हो गया,

हालांकि एक बार तो मैं भी भाग जाना चाहता था, 

जिम्मेदारियों के बोझ से दूर कहीं,

पर मैं रुका रहा,

परिवार बढ़ता गया और मैं घटता गया,

फिर भी शिकायतें नहीं थी मन में,

तुम्हें देखकर खुश हो लेता था, 

जब कमजोर पड़ता तो अकेले रो लेता था,

किससे कहता की कुछ दिन घर से छुट्टी चाहिए,

मैं कमजोर था, सो तुम से भी मदद नहीं मांगी,

कि मेरा सहारा बनो,

अब देखता हूं तो लगता है,

तुम पर विश्वास कर लेना चाहिए था,

जब तुम कहती थी पापा सब सम्हाल लूंगी,

मुझे तुम पर ये बोझ डाल देना चाहिए था,

पर मेरी नन्ही गुड़िया,

मैं कमजोर था,

सो तुम्हें बचा नहीं पाया, उन अनजान अनचाही छुअन की पीड़ा से, उस घुटन से,

जो आज तक तुम्हें सताती है,

डराती है मर्दों के साए से,

मैं भी मर्द हूं, 

और आज मैं उन सभी नामर्दों की ओर से तुमसे माफ़ी मांगता हूं।

जिसने तुम्हें कभी गलत नजर से देखा, 

घर लौट आओ अब प्यारी गुड़िया,

जो मैं फिर से चीखू, चिल्लाऊं, या फिर तुम पर हाथ उठाऊं,

तो मुझे रोक लेना इस बार,

चाहे हो जाए तकरार,

आखिर तुम भी कब तक सहोगी,


मैं चाहता तो दूर रख सकता था तुम्हें, 

उन कर्जदारों से जो दहलीज पर आकर चीखते थे,

उन रिश्तेदारों से जो हैवान से कम न थे,

उन सब लड़ाइयों से जो मैंने तुम्हारी मां से लड़ी,

पर मैं भी इंसान हूं,

मुझसे गलतियां हो गई हैं,

मैं ये तो नहीं कहता कि तुम मुझे माफ कर दो,

और लौट आओ,

क्योंकि ये इतना आसान नहीं,

पर मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं,

मेरी गुड़िया,

हो सकें तो मुझे माफ कर देना,

और हो सके तो लौट आना,

 जब भी तुम्हें ठीक लगे,

मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा।


खत, एक हैवान के नाम

तुम,
हां तुम्हीं,
जिसकी बदौलत आज तक मैं अपनी देह से घृणा करती हूं,
खुद को सजाने में डर लगता है,
अक्सर रातों को डर के मारे हांफते हुए उठ कर बैठ जाया करती हूं,
जो जख्म तुमने दिए हैं, 
वें मेरी देह पर नहीं, मेरी आत्मा पर लगे है,
तुम्हारी वो गंदी नजरें,
और अनचाही छुअन,
आज तक भूल न सकी,
पसीने में तर, आज भी,
डर से कांपने लगती हूं,
तुम जानते थे कि ये गलत है,
तुम्हारी अंतरात्मा ने तुम्हें रोकने की तमाम कोशिशें भी की होंगी,
कहा होगा, कि ये एक छोटी बच्ची है,
इसके साथ ऐसा मत करो,
पर तुम न माने,
क्योंकि तुम जानते थे कि इसकी बात कोई नहीं मानेगा,
कितना डरती है ये अपने मां बाप से,
ओर उन्हें कहां फुर्सत की वें इसके बदलते व्यवहार पर सवाल करेंगे,
मैं डरपोक थी, सहम गई,
गलती तुम्हारी थी, 
लेकिन आज तक सजा खुद को दे रही हुं,
तुम आज भी शान से घर आते हो,
रिश्तेदार जो ठहरे,
मेरे अपनों के लिए मेरी घुटन से ज्यादा तुम जरूरी हो,
पर मैं आज तक चुप हूं,
अंदर ही अंदर तिल तिल मरती हूं,
तुम्हें बददुआएं देती हूं,
पर कल मुझे मालूम हुआ कि तुम्हारे भी एक फूल से बेटी है,
भगवान न करें कोई चाचा, मामा, ताऊ या भाई बनकर उसके साथ वहीं दोहराए, 
जो तुमने मेरे साथ किया,
और तुम्हें आगाह करती हूं कि अपने घर में किसी हैवान के लिए जगह मत रखना,
अपनी बेटी को इतना भी मत डराना
कि उसके व्यवहार में आए बड़े बदलाव भी तुम्हें मामूली ही लगें,
जब कभी उसके आंसू बहते दिखाई पड़े,
तो पूछ लेना,
 कि उसे कोई परेशानी तो नहीं?
आखिरी सांस तक मेरी बददुआएं तुम्हारे साथ है,
पर तुम्हारी बच्ची के लिए मैं प्रार्थना करूंगी,
तुम बस उसे बचाएं रखना,
कभी दोस्त बनके,
कभी पिता बनके,
पर न मैंने तुम्हें माफ किया,
उस गलती के लिए,
न खुद को कर पाऊंगी,
चुप रहने के लिए,
सब कुछ अकेले सहने के लिए,
फिर भी तुम्हारी बेटी खुश रहे,
यहीं प्रार्थना करूंगी।

    

Thursday, April 23, 2026

बनारस याद आता है

बनारस याद आता है, 
वो गालियां याद आती है, 
वो अस्सी घाट की सुबहें, 
वो तुलसी घाट की शामें, 
वो एकटक देखना उसको,
उसी को मां समझना फिर,
उसी से दोस्ती करना,
वो गंगा का किनारा था, 
कि जिससे गुफ्तगू करना, 
कि वो जो मां सी ममता थी,
गंगा आरती में, मां की लहरों में,
वो एक कठपुतली वाले दादा थे,
जो संग में चाय पीते थे,
कभी किस्से सुनाते थे,
कभी बातें बताते थे,
कि मेरा दिल नहीं लगता,
वो गालियां याद आती है।


ये जीवन

चुनर से बाजार सजे हैं,
सुना हैं बस घर आंगन,

तन पर मेघा बरसी हैं पर,
सुखा है ये मन प्रांगण,

मोह के पंछी सारे उड़ गए,
बचा रहा बस मेरा मन,

 मैने किया हैं आज समर्पित,
अपनी कलम को ये जीवन,



Sunday, March 22, 2026

23 march 26

मैं एक घटिया इंसान हूं क्योंकि जो शब्द, कर्म और व्यवहार मेरे नियंत्रण में थे, मैंने उनका उपयोग केवल दूसरों का फायदा उठाने, उन्हें नीचा दिखाने और दिल दुखाने में किया, 
बजाय किसी की भलाई करने, सम्मान करने, सराहना करने या प्यार देने के।
आज ये स्वीकारना जरूरी हो गया है कि मैं एक घटिया इंसान हूं।



मुझे अच्छा बनने की जरूरत नहीं है क्योंकि पहले मुझे बुरा बनना बंद करने की जरूरत है, तब कहीं जाकर मैं एक आम इंसान की श्रेणी सकूं।



22 march 26

उसका जाना मुझे पूरी तरह खाली कर गया है, क्यों? 
मैं भी यही चाहती थी न कि वो चला जाए तो अब ये खालीपन क्यों? ये मलाल क्यों? कि कभी उसे समझा नहीं, समझने की कोशिश नहीं की, काश एक मौका और मिल जाता, काश वो लौट ये सब सिर्फ अटैचमेंट है, कंफर्ट है या फिर कोई बोझ जिसे मैं ढोना चाहती हूं बजाय ये स्वीकारने के कभी मुझे उससे प्यार था ही नहीं और न जाने कब तक मैं उसके अच्छे होने का फायदा उठाने वाली थी, न जाने कब तक मैं उसे अकेलेपन से लड़ने के लिए और अकेला कर देने वाली थी?
क्या मुझे सच में कभी उससे प्यार था???
क्या मैने कभी भी दिल से माफी मांगी?
क्या मैंने कभी भी दिल से कोशिश की थी उसे रोकने की, पूरी ईमानदारी से?
जवाब है नहीं, 
उससे प्यार होने के बावजूद मैंने कभी ईमानदारी नहीं दिखाई, कभी सच्ची परवाह की ही नहीं, कभी सच्चे मन से उसे रोका ही नहीं तो फिर उसके जाने का इतना दुख क्यों?
किस बात पर मैं खुद को ये कह रही हूं कि मैंने तो कोशिश की थी, कब की कोशिश???
उसका जाना जरूरी था, यही सही भी है, वो मेरे जैसे एक स्वार्थी और लालची इंसान के साथ सिर्फ परेशान ही होता, जिसे अपने सिवाय कुछ दिखाई ही नहीं देता।
आखिर क्यों रुकना चाहिए था उसे?
ऐसा क्या था मेरे पास उसे देने के लिए सिवाय बातों के???
उसे प्यार की जरूरत है और मुझे तो अपनी शिकायतों और कमियां निकालने से ही फुर्सत नहीं है।
प्यार क्या होता है ये कोई उससे सीखे, परवाह करना किसे कहते है ये भी उसे देखे तो समझे, 
एक ईमानदार इंसान होना, अपनी जिंदगी और वक्त दोनों अपने प्यार पर निस्वार्थ भाव से लगाना कोई उससे सीखे,
अपने आप को स्वीकारना, अपनी भावनाओं को समझना, अच्छी बुरी दोनों तरह की भावनाओं के साथ अपनी कमियों को समझना और इंपरफेक्शन को स्वीकारना कोई उससे सीखे,
कुछ परेशानियां थी उसकी जो मैं कभी जान ही नहीं पाई, समझ ही नहीं पाई, जिनसे वो अकेले ही लड़ता रहा, मेरे होने के बावजूद उसे कभी मेरा होना महसूस ही नहीं हुआ,
और न मैंने कभी समझने की हिम्मत दिखाई,
क्योंकि मैं एक डरपोक और आलसी इंसान हूं।
मैं अपनी छोटी-छोटी उलझनों को इतना बड़ा बनाती रही कि कभी उसकी बड़ी से बड़ी तकलीफ भी मुझे दिखाई नहीं दी।
आज जब पछताती हूं तो खुद से पूछती हूं कि आखिर किस बात की सजा दे रही थी मैं उसे??
आखिर क्यों किया मैंने ऐसा?
क्या इतना जरूरी था मेरा उसे नजरंदाज करना?
ऐसी कौनसी खुशियां पा ली मैंने उससे दूर होकर सिवाय इस मलाल के काश वो दिन लौट आये।
क्योंकि अब उसका लौट आना बहुत मुश्किल लगता है, हर बार मेरी नासमझी ने सब कुछ इतना खराब कर दिया है कि अब मैं चाहूँ भी तो उसकी परछाई भी नहीं छू सकती।
मगर आज भी मैं सिर्फ अपने बारे में सोचूं तो खुद से नजरें नहीं मिला पाऊंगी।
सो अब उसकी खुशी के लिए उसे जाने देना ही सही होगा, उसे खुश रहने का पूरा हक है, उसे भी समझे जाने, सुने जाने का हक है और उसे अब ये महसूस करना भी चाहिए कि जितना प्यार उसने दिया, जितना सम्मान उसने दिया है वह उससे कई गुना ज्यादा प्यार किए जाने के लायक है।
हम दूसरों को वही दे सकते है जो हम है या हमारे पास है, उसने मुझे एक नई नजरिया दिया, प्यार दिया, सम्मान दिया, अपनापन दिया, सुरक्षा दी, संबल दिया और आज सबसे जरूरी चीज अपने सच को स्वीकारने की ताकत दी क्योोंकि वो एक सच्चा इंसान है जिसे दूसरों को नीचा दिखाकर बड़ा बनने के बजाय हर बुराई में भी एक अच्छाई देख लेने की आदत है।
हे ईश्वर मैं और मेरी प्रार्थनाएं उसकी तरह सच्ची तो नहीं मगर उसे इस दुनियां की सारी अच्छाई, खुशियां और प्यार मिलें।



मैं अपनी नकारात्मक ऊर्जा तक भी उस तक पहुंचने नहीं देना चाहती, इसलिए मैं चाहती हु कि वो हर माध्यम से मुझसे दूर हो जाए।
मैं एक घटिया, मौकापरस्त, अंहकारी, बेकार और आलसी इंसान हूं।
मेरे इरादे कभी नेक नहीं थे न ही मैंने अपनी जिंदगी में कभी मेहनत करने की कोशिश की है इसलिए किसी भी चीज और इंसान कभी कद्र ही नहीं सीख पाई 
मुझे जैसे झूठे, कमजोर और आलसी इंसान को न उससे माफी मांगने हक है न ही उसे याद करने का, न कभी उससे कुछ मांगने या उसकी दया तक कि उम्मीद रखने का हक है।
मैं नहीं जानती कि मैं इसका पश्चाताप कैसे करूंगी लेकिन आज के बाद कभी खुद को या दूसरों को एक अच्छा इंसान होने का झूठा दिखावा नहीं करूंगी 
मैं ये स्वीकार करूंगी मैं एक स्वार्थी और घटिया इंसान हूं।

सच, झूठ और ये उलझने?

मैं और मेरा परिवार, बहुत झूठे और बेईमान लोग है, 
हम इतने झूठे और बेईमान है कि हमें अपने ही अंतर्मन की आवाज अपने कानों तक सुनाई नहीं देती, 
हमारे पास वक्त ही नहीं है अकेले बैठकर अपना सामना करने के लिए, हम एक बहुत झूठी जिंदगी जिये जा रहे है, जिसे देखकर कोई अजनबी भी कह सकता है कि कितना दिखावा है, कितना झूठ हंसते है ये लोग, प्यार और सामंजस्य की सिर्फ दलीलें है, कोई आपसी प्यार या समझ नहीं, यहां तक कि इतने सालों से एक साथ एक ही मकान में रहने के बावजूद कोई एक दूसरे को ठीक से जानता तक नहीं, 
हम कभी खुश थे ही नहीं, लेकिन हमने हमेशा खुश होने का झूठा दिखावा किया है, हमेशा एक नकली चेहरा पहने हम सब अपने आप से और अपने सच से भागते रहे है।
हम सब अच्छा बनना चाहते है सिर्फ दूसरों की नजरों में, सच में अच्छा बनने की हमने कभी कोशिश तक नहीं की, 
हम ने हमेशा एक दूसरे को नीचा दिखाना सिखा, झूठ बोलकर अपने अहंकार को ऊंचा रहना सिखा बजाय दूसरों की भावनाओं और विचारों का सम्मान किए।
हम कहने को तो एक दूसरे का सहारा है लेकिन हमें ये कभी पता नहीं होता कि हमारे साथ बैठकर खाना खा रहा मुस्कुराता हुआ इंसान आज आत्महत्या करने के विचारों से अंदर ही अंदर लड़ रहा है। हम कभी खुश थे ही नहीं, हमने कभी चाहा ही नहीं कि हम कभी सच में खुश रहना सीख पाए क्योंकि हमें अपनी परेशानियां रोने और बेचारा बने रहने की गैर जरूरी आदत सी पड़ गई है।
हमें अपने जीने का मकसद तक नहीं पता, 
कि आखिर हम जी क्यों रहे हैं? 
किसके लिए ये तमाम झूठे और खोंखलें ठाकोसले निभाएं जा रहे है, आखिर कौन देख रहा है जिसे हम खुश करना चाहते है??? 
आखिर किसके लिए हम ये सब किए जा रहे है????? 
जब किसी सच्चे इंसान से मेरा सामना हुआ तो मैं इतनी खुदगर्ज थी कि मैंने उसे भी अपनी तरह बनाना चाहा या फिर समझने से बचती रही कि कितना जरूरी है सच को जानना, उसे स्वीकारना, उसकी राह पर चलना, मैंने कोशिश भी करनी चाही अपने तमाम सीखें पाठों को भूलने की, जिनमें सिर्फ झूठ, बेइमानी, स्वार्थ और अहंकार था लेकिन इंसान की फितरत कहां बदलती है, न चाहते हुए भी एक मोड़ ऐसा आया जहां मेरे दिये छोटे छोटे घाव उस इंसान को पूरा तोड़ गये, 
अब वो अपने सच के साथ है, 
और मैं फिर वहीं उसी झूठी दुनिया में, झूठा मुस्कुराने लौट आई हूं।

Monday, March 9, 2026

अयोध्या यात्रा

वैसे तो हम बनारस आने के लिए निकले थे, मगर जब अहेतु की कृपा हो तो सब सहज हो मिल जाता है।
ये कहानी शुरू तो मेरे जन्म से हुई थी, लेकिन ये बात 2022 की है।
वैसे कई लोग है जो मुझे अपना दोस्त, साथी, शुभचिंतक मानते है, यहां बनारस में भी और वहां इंदौर में भी। मगर मेरे सबसे अच्छे साथी, मेरे बचपन के दोस्त और मेरी दुनिया मेरे पापा रहे है। बीते एक वर्ष में हमारा रिश्ता तो मजबूत हो गया लेकिन हमारी दोस्ती जरा कमजोर पड़ गई थी। जब आपका सबसे करीबी दोस्त रूठ जाए तो पीड़ा, प्रेम से अधिक गहरी होती है। 
दो प्रेमियों के बिछड़ने पर जितनी पीड़ा होती है उससे कई गुना ज्यादा पीड़ा तब होती है जब आपका कोई प्रिय, आंखो के सामने होकर भी न हो, तन से उपस्थित हो किन्तु मन से कई खोया हुआ।
मेरे राघव जी से ये देखा न गया, कि उनकी ये नन्हीं भक्त अपने उस दोस्त को सबसे ज्यादा याद करती है, जिसके प्रेम में कभी-कभी वह अपने प्रभु तक को भूल जाती है।

"सो होई जेहि राम रखी राचा"

होना क्या था हम साथ साथ बनारस आए मगर हम साथ थे नहीं, अचानक खाना खाकर बाहर घूमने निकले तो मैंने बस यूंही कहा कि आपकी ट्रेन तो दो दिन बाद है तब तक अयोध्या हो आइए,
उन्होंने कहा कि हां बात तो सही है, एक काम करो तुम भी हमारे साथ चलो,
मैं न करते करते भी साथ चल दी,
जिस क्षण अयोध्या पहुंचे, उस शाम से लेकर अगली सुबह तक जैसे सारे गिले शिकवे भूल कर हम फिर दोस्त बन गए थे। हालांकि एक पिता और बेटी के बीच हुई पिछली अनबन की थोड़ी टीस हमें छूने कोशिश कर जरूर रही थी। पर अमन भैया कहते है न कि "सब रूठे बच्चों से लेकिन मैया रूठ नहीं पाई,"
और अपने दोस्त में मैंने हमेशा मां पहले देखी, बाद में वें मेरे पिता बने। शायद लोगों को उनका ज्यादा भावुक स्वभाव का होना और मुझे इतना सवेंदनशील बनाना कमजोरी लगता हो लेकिन मेरे पिता एक मजबूत और सच्चे हृदय वाले इंसान है। एक पुरुष को रो लेने और अपनी भावनाएं दिखाने के लिए जो हिम्मत चाहिए, वह उनके अंदर जैसे कूट कूट कर भरी है, हालांकि वें मुझसे ज्यादा जिद्दी और नाजुक दिल वाले इंसान है, यही सहजता उनकी अलग पहचान है।
कहीं किसी ने कहा है कि पुरुष जब विकसित हो जाता है वह स्त्री सी ममता और समर्पण सिख जाता है। मुझे गर्व अपने पिता पर, नहीं अपनी मां पर, अपने सबसे अच्छे दोस्त पर।
कभी-कभी उनसे शिकायतें भी करती हूं, लेकिन शिकायतें भी उन्हीं से की जाती है जिनसे हम बेहद प्यार करते हैं।


एक खत, मां के नाम

मां तुम मेरे प्रेम या नफरत की नहीं, दया की पात्र हो,
पहले मैं तुमसे नफरत करती थी कि तुम मुझे कभी समझ नहीं पाई,
अब मैं तुम पर दया भाव रखती हूं कि तुम्हें भी किसी ने नहीं समझा,
मेरी शिकायत थी कि तुमने कभी मुझे प्रेम नहीं दिया,
अब मैं क्षमा प्रार्थी हूं कि तुम्हें कभी भी प्रेम नहीं मिला,
मैं चाहती थी कि तुम मेरे लिए लड़ो, मेरा सहारा बनो कमजोरी नहीं,
अब मैं जानती हूं कि तुम कमजोर नहीं थी, सिर्फ अकेली थी, 
जिसके पास खुद कोई सहारा नहीं रहा,
तुम हमेशा शिकायतें करती रही हो, 
खैर उन्हें भी कभी सुना नहीं गया,
तुम डरपोक नहीं थी, पर तुम में मुझ सा साहस भी कभी नहीं था,
मैं अगर तुम्हारी जगह होती तो, मैं अपनी बेटी को रोकने के बजाय पंख देती, उसे खुला आसमान देने के लिए दुनियां भर से लड़ जाती,
मगर तुमने हमेशा मेरे पंख कुतरे और चाहा कि मैं जमीन पर रहूं,
वहीं सहू जो तुमने सहा, वहीं करूं जो तुमने किया,
सीधे बैठना, कम ही बोलना,
सिर पर पल्लू, सबकी सेवा में रहना,
अच्छा मां हो सके तो,
अगले जन्म तुम मेरी बेटी बनना,
मैं दुनिया का सारा प्यार, सारा दुलार तुम्हारी झोली में रख दूंगी,
पर तुम्हें पतंग नहीं पंक्षी बनने दूंगी,
जिसकी डोर कोई नहीं पकड़ सके,
मैं तुम्हें खुला आसमान देने के लिए सारी दुनिया से भी लड़ जाऊंगी,
तुम्हें आज़ादी का मतलब तब समझ आएगा,
तब तुम मेरी दया की नहीं,
मेरे प्रेम की पात्र बनोगी मां।
- रैना

Thursday, October 23, 2025

रिश्ता

बाबा, कल किसी से कह रहे थे,
कि एकादशी बाद कोई लड़का मुझे देखने आने वाला है,
लड़का अभी CA की तैयारी कर रहा है?
क्या?
तैयारी कर रहा है?
तो तैयारी करें, यहां क्यों आ रहा है भला।
खैर,
मन में बहुत सी उलझने है, 
बेचैनी भी,
बहुत सी अनकही बातें भी है जो कभी कहीं न जा सकेंगी,
अगर कह पाती तो मैं कहती शायद,
बाबा,
एक उम्र बीता दी मैंने आपकी अच्छी बेटी बनने में,
मगर बन न सकीं।
एक उम्र बीता दी एक जिम्मेदार बहन बनने में मगर अंततः बन न सकीं।
एक पूरी उम्र लगाई मैंने अपनी दादी की अच्छी पोती बनने में मगर बन न सकीं।
मगर क्यों?
शायद इसलिए कि मेरी अच्छी की परिभाषा कुछ ओर थी और उनकी कुछ ओर,
या शायद यहां कितना भी कुछ कर लिया जाए, 
एक गलती सारी अच्छी बातें भुला ही देती है।
हो सकता है मैं एक उम्र बीता दूं, 
अच्छी पत्नी, अच्छी बहु बनने में, 
मगर बन न सकूं,
हो सकता है कि मां की तरह मुझे भी अंततः यही सुनने मिलें,
मगर मैं बस इतना जानना चाहती हूं कि इस बेटी से बहु तक के सफर के बीच क्या मैं अपनी ही जिंदगी से थोड़ा वक्त मैं बनने के लिए ले सकती हूं??
जिसे सिर्फ मैं, मेरी अंतरात्मा जानती है,
जो मैं वाकई में हमेशा से बनना चाहती थी,
क्या मुझे अपनी ही जिंदगी से थोड़ा वक्त मिल सकता है?
अपने आप को चुनने के लिए,
जानती हूं आपके सामने समाज और समाज के हजारों सवाल खड़े होंगे,
मगर क्या मेरे अस्तित्व को मारकर, 
मेरी आत्मा की हत्या कर,
समाज की इस नियमावली को मानना जरूरी है?
मैं कह पाती तो कहती, 
कि नहीं देख सकती मैं खुद को ऐसे,
जैसे अपनी मां को देखती हूं,
हर दिन अपना मन मारकर,
अपमानित होकर जीते हुए,
इससे पहले कि मुझे भी इस गुलामी का हिस्सा बनाया जाए,
मैं जी लेना चाहती हूं,
सांस लेना चाहती हूं,
खुद को ढूंढना चाहती हूं,
कि आखिर जब मैं एक बेटी, एक पत्नी और एक बहु नहीं हूं, तब मैं कौन हूं???
मेरी अपनी कोई मौलिक सोच है भी या नहीं ?
अगर मैं अपनी मां कि तरह खुद को नहीं देखना चाहती तो फिर मैं खुद को कैसे देखती हूं?
आखिर मैं क्या चाहती हूं???


एक खत, बेटी के नाम

हालांकि मेरी भी शिकायतें हैं तुमसे, एक अरसा हुआ तुम घर नहीं लौटी, जो गर तुम आ जाती तो मैं तुम्हें बताता, कि मैं भी एक पिता होने से पहले एक इ...