जिसमेें मां है, और है नानी,
मीना कहती थी जिसको दुनिया,
जिसको इक बिटिया मां कहती थी,
वह बेचारी चुप रहती थी,
बिन बोले सब कुछ सहती थी,
मीना थी बड़ी सयानी गुड़िया
आंगन की एक छोटी चिड़िया,
एक दिन उनके बाबा ने सोचा,
ब्याही जाए छोटी बिटिया,
फिर सोएंगे चैन की निंदिया,
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मीना ब्याही गई, चुन्नी से,
चुन्नी बड़ा अक्खड़, अड़ियल था,
लेकिन दिल का साफ बड़ा था,
जीवन से वह खूब लड़ा था,
पर जाने क्यूं नहीं समझा,
रहता था अपने में उलझा,
मीना जो बेटी हैं किसी की,
उसको उसने खुब सताया,
बना गुलाम, डांट, मार कर
अपनी पत्नी को धमकाया,
मुंह न खोले,
कुछ न बोलें,
अपना मन भी वह नहीं टटोले,
मीना डर-डर कर रहती थी,
चुप रहती थी, सब सहती थी,
फिर एक खुशी आंगन में आई,
दो प्यारी बेटी चुन्नी ने पाई,
थोड़ा पिघला, थोड़ा बदला,
पर उसकी फितरत न बदली,
फिर भी मीना को खुब सताया,
कभी रुलाया, कभी डराया,
नहीं हसाया, नहीं मनाया,
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आंगन में चुन्नी के दो चिड़िया थी,
बड़ी बहु हुई वह,
जो उसकी छोटी गुड़िया थी,
थोड़ी अल्हड़, थोड़ी पगली,
चंचल थोड़ी, थोड़ी मचली,
घर से, काम से थी अनजान,
किस्मत जिसकी थी बेईमान,
आई जेल में, फिर वो सम्हली,
जब चुन्नी ने अपनी बेटी ब्याही,
वही कहानी, फिर न चाही,
उसकी बेटी प्यारी उसे थी,
मीना, तो एक कटपुटली थी,
उसकी पीड़ा किसे खली थी,
रोती थी बेचारी हर दिन,
काटी उम्र सब आंसू गिनगिन,
मीना ने बिटिया को यही सिखाया,
चुप रहना, तुम सब सहना,
एक चू भी नहीं है कहना,
तुम भी एक कटपुतली बनना,
रोती रहना, कुछ न कहना,
लेकिन कर्म तो कर्म है भैया,
कैसे रहती बिटिया सुख से,
पिता के कर्मों का फल, दुख थे,
नियति ने वहीं कहानी फिर दोहराई,
जो थी न चुन्नी ने चाही,
अब चुन्नी की बिटिया रोई,
तड़पी, मचली, जागी न सोई,
उसे पति ने खूब सताया,
खूब रुलाया, और सताया,
कर्म है लौटा,
चुन्नी को सबक सिखाया,
तुमने भी तो एक लडकी को,
खूब रुलाया, खूब सताया,
वो भी तो बेटी थी किसी की,
नाजों से पली थी, थोड़ी पगली थी,
इतना क्यों वह समझ न पाया,
अब जब बिटिया उसकी रोई,
तो कैसा छट पट पैर पटकता,
पंखे पर रस्सी से लटकता,
पर उतनी भी तो हिम्मत न थी,
बिटिया भले कुछ कहती न थी,
पर पिता से आंसू कैसे छिपते,
चुन्नी के अब सब सुख, दुख थे,
सो चुन्नी ने पश्चाताप किया,
अपना पलड़ा साफ किया,
मीना को सम्मान दिया,
पत्नी का थोड़ा मान दिया,
दुनिया बदली, बदले जोगी,
वही कहानी फिर न होगी?
ऐसा कैसे हो सकता है,
अब बिटिया, बिटिया की भी है,
उस छोटी गुड़िया की भी है,
जिसे पति ने खुब सताया,
खूब रुलाया, खूब डराया,
अब बारी उसकी बिटिया की,
उसने बेटी को यहीं सिखाया,
चुप ही रहना, कुछ न कहना,
सब कुछ सहना, हसती रहना,
मन दुखता हो, बुरा लगता हो,
दर्द हो चाहे, चाहे घुटन हो,
चुप ही रहना, सब कुछ सहना,
मन हो न हो, फिर भी है निभाना,
साथ पति के कदम, न लाना,
पीछे चलना, हाथ न मलना,
नजर झुकी हो, हाथ बंधे हो,
देखना नहीं, जैसे हम अंधे हो,
ज्यादा बोली तो मार खाओगी,
सो तुम भी चुप रहना चाहोगी,
सब कुछ सहना,
कुछ न कहना,
हक न मांगना,
जल्दी उठना,
रात जागना,
प्यारी बिटिया,
जाओ, जाओ,
वहीं कहानी,
फिर दोहराओं,
दूल्हा लाए, तुम्हें सताने,
खूब रुलाने,
खूब रुलाने,
मीना और बिटिया, चली जहां से,
नई कहानी शुरु यहां से,
मीना की बिटिया की बिटिया,
वहीं कहानी सुनकर बोली,
क्या हो जो मैं नहीं निभाऊं,
क्या हो गर मैं नजर उठाऊं,
क्या हो गर मैं सबक सिखाऊं,
उन सब मर्दों को,
जिनकी खातिर,
हम गुलाम है,
नहीं दोहरानी, वहीं कहानी,
जिनमें औरत, डर में रहती हो,
चुप रहती हो, सब सहती हो,
गूंगी बन कुछ न कहती हो,
नहीं दोहरानी वहीं कहानी,
शShhhhhhhhhh
मां ये देखकर,
हंसकर बोली,
अच्छा,
जाओ,
कोशिश कर लो,
तुम भी थोड़ी हिम्मत धर लो,
लौट आओगी,
मार खाओगी,
कुछ भी न जब कह पाओगी,
हाथ मलोगी, पछताओगी,
गूंगी बन वापस आओगी,
या शायद मारी जाओगी,
ये समाज मर्दों की सुनेगा,
वहीं कहानी फिरसे चुनेगा,
अब किसकी बेटी रोएगी,
क्या पाएगी, क्या खोएगी,
क्या जागेगी, क्या सोएगी????
क्योंकि कर्म तो कर्म है भैया,
क्या फिर लौटेगा,
सबक सीखाने,
किसे रुलाने?
किसे सताने???
✍️निहारिका "रैना"