आज सुबह से ही एक बात बार बार मेरे जहन में आ रही थी, कि हमेशा मेरी स्कूल की मीटिंग में पापा, भैया या दीदी ही क्यों जाते रहे हैं, कभी मां क्यों नहीं गई ?
क्यों मां हमेशा मना कर देती हैं किसी काम के बहुत जरूरी होने का बहाना बनाकर, क्युं वो मेरे शिक्षकों और दोस्तों से दूरी बनाए रहती हैं क्या उन्हें नहीं जानना कि मैं किसी छात्रा हूं?
आखिर क्यों?
शाम धीरे धीरे ढलने लगी थी, और अब मुझसे रहा नहीं गया तो मैने मां से पूछ ही लिया,
पहले उन्होंने बहुत हद तक टालने की कोशिश की और चुप हो गई,
एक लंबी चुप्पी के बाद बोझिल मन से बोली- मुझे शर्म आती है,
मैं अनपढ़ जो हूं, और झल्लाकर कर बोली तेरे मास्टर जी और तेरे दोस्तों की तरह मुझे अंग्रेजी में गिटिर-पिटिर नहीं आती बस इसीलिए नहीं जाती ......... । काफी देर मौन रहा, मां ने कुछ खिन्न भाव से मेरी ओर देखा और फिर अंदर चली गई ।
मैंने अंदर जाकर पूछा-
किस बात की शर्म ?
थोड़ी देर बाद फिर सब मौन रहा ।
मां ने कहा - तुझे मेरे साथ जाने में शर्म आती होगी....... कहीं तेरे दोस्त तेरा मजाक ना बनाए कि तेरी मां को कुछ नहीं आता........... और इस उम्र में पढ़ लिख तो नहीं सकती........ और फिर वह चुप हो गई ।
एक क्षण भर के लिए मैं स्तब्ध हो गई फिर एकाएक मेरे अस्तित्व ने विद्रोही के स्वर में कहा-
(कहा मेरे मन के भीतर ही बाहर एक शब्द भी नहीं निकला- मां यह क्या हो गया है तुम्हें जो तुम ऐसी बातें कह सकती हो अभी जब तुम्हारा सारा जीवन तुम्हारे आगे है,) एकाएक मैंने जाना कि वह भावना मिथ्या का नहीं है और ना ही शर्म का है, वह भावना केवल एक डर है, और यह डर उनके जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है लगता है कि वह उसे पहचानती ही नहीं है
लेकिन मैंने उस डर को देख लिया है।
इतनी देर में पूर्ववत शांति हो गई थी,
मां चुपचाप कपड़ो पर स्त्री कर रही थी तभी मैंने अपनी भारी पलके उठा कर अकस्मात किसी ओर अस्पष्ट प्रतीक्षा से मां की ओर देखा और दबती हुई आवाज में मैंने कहा -कैसी शर्म ? किससे डरती हो ?
बोलो ?
क्या तुम जानती हो ? कि जितना संघर्ष तुमने मेरे लिए किया है उतना हिंदी या अंग्रेजी भाषा ने नहीं किया, मास्टर जी या मेरे दोस्तों ने नहीं किया और आज अगर मैं अच्छे स्कूल में हूं अच्छे दोस्तों के साथ पढ़ती हूं तो इसका कारण भी सिर्फ़ तुम हो, अगर तुम नहीं होती तो मैं भी नहीं होती ।
मुझे अच्छे संस्कार मास्टर जी या किताबों ने नहीं दिए तुमने दिए हैं । तो तुम कैसे सोच सकती हो कि तुम्हारे बच्चों को तुम्हें लेकर कभी शर्म महसूस होगी ।
क्या तुम नहीं जानती ? कि तुम दुनिया की सबसे अच्छी मां हो। क्या तुम नहीं जानती हो ? कि तुम्ही ने हमे इतना काबिल बनाया है, क्या तुम नहीं जानती ? कि तुम्हारे बिना मैं कुछ भी नहीं हूं । क्या तुम नहीं जानती ? कि तुम मेरे लिए मेरी जन्नत हो, जहान हो, क्या तुम सच में नहीं जानती मां ?
मां तुम अनपढ़ नहीं हो, तुम तो वह टहनी हो, जिस पर पत्तों का भार होता है, वह पत्ते जो बनाते हैं कुछ लकड़ी के खंभों को पेड़ । हां मां तुम वही टहनी हो जिसने इस वीरान पड़े मकान को एक हंसता खेलता घर बना कर, हमें जीना सिखाया है । हमें अपनी काबिलियत को पहचानना सिखाया है ।
क्या तुम सच में नहीं जानती ? कि तुम्हारे बच्चों को तुम पर गर्व है, नहीं । शर्म हमें तुम पर गर्व हैं मां । और ये उत्तर सुनकर मां की आंखो से बस आसुओं की धार बहने लगी और गला रुग्ध हो गया, और फिर एक ओर मौन बना रहा लेकिन इस मौन में खुशी थी डर नहीं ।
तुम्हारी वेशभूषा पर, तुम्हारी सोच पर, तुम्हारे संस्कारों पर, हमें गर्व है मां ।