मैं एक भागते शहर में पली-बढ़ी लड़की,
इस ठहरे से शहर से आत्मियता सीख रही हूं,
यहां सुकुन है, ठहराव है, जीवन है, ओर मृत्यू भी,
यहां सब कुछ मिथ्या है, और सत्य भी,
मेरे शहर में एक भीड़ दौड़ रही है,
जो न रुकती हैं, न थकती हैं,
वहां दौड़ है, होड़ है, अनंत चाह है,
यहां जीवन है, संवेदना है, प्रेम है, भाव है,
वहां सपने या अपने में से किसी एक को चुनना है,
यहां सपनों के लिए अपनों से अलगाव नहीं,
यहां पराए भी अपने हो जाते है,
अक्सर जीवन से थक जाने पर,
लोग घाट पर ही सो जाते है।