कभी कभी हम दूसरों की खुशीयों का खयाल रखना इतना जरूरी समझते हैं कि हम अपने आप को वर्षो के लिए भूल जाते हैं,
भूल जाते हैं कि एक मन हमारे पास भी हैं जिसे दर्द, पीड़ा या घुटन भी महसूस होती हैं। रिशतों को हम अपने जीवन में सबसे ऊपर रखते हैं और इन रिश्तों का चश्मा हमारी आंखों के सामने इस तरह से लगा होता हैं कि हमें सही, गलत, झूठ, सच, तेरा, मेरा कुछ भी दिखाई नहीं देता।
बहुत मुश्किल होता हैं इस चश्में को आंखों से हटा पाना और उससे भी मुश्किल हैं दुनिया देखने की कोशिश करना, एक अलग नजरिए से, जैसे हम कभी नहीं देख पाए।
थोड़ा मुश्किल हैं पर नामुमकिन नहीं,
कुछ समय लगेगा खुद को ढूंढने में, अपनी खुशियों को सबसे पहले रखने में लेकिन मुझे यकीन हैं कि अगर हमने पहला कदम उठा लिया तो सब आसान हो जाएगा।
बस अब सब की जिम्मेदारियों के साथ साथ अपनी जिम्मेदारी भी लेनी हैं अपनी खुशियों की, क्योंकि खुशी अपनी हैं तो खयाल भी हमें ही रखना होगा न।
हम बेवजह ही दूसरों के दुखों का टोकरा अपने सर लेकर घूमते रहते हैं जबकि हम उनकी खुशीयों की चाबी भी तो बन सकते हैं।
हमारे किसी बहुत करीबी का गुस्सा, चिड़चिड़ापन, हम इतना ज्यादा अपने मन पर ले लेते हैं कि हमें लगने लगता हैं कि उनकी खुशियों की सारी जिम्मेदारी हमारी हैं, उनके गुस्से की वजह हम हैं, उनका मूड ठीक करना हमारी जिम्मेदारी हैं,
जबकि हम दूसरों को फिक्स करने के लिए नहीं हैं। अगर हम उनके व्यवहार से इतने प्रभावित हैं कि हम अपना सबकुछ भूल कर सिर्फ उनके स्वभाव के अनुसार ही व्यवहार करने लगते हैं, लेकिन क्या यह सही हैं? हम दूसरों के व्यवहार से प्रभावित होकर अपना मन दुखी करे क्या ये सही हैं?