हां तुम्हीं,
जिसकी बदौलत आज तक मैं अपनी देह से घृणा करती हूं,
खुद को सजाने में डर लगता है,
अक्सर रातों को डर के मारे हांफते हुए उठ कर बैठ जाया करती हूं,
जो जख्म तुमने दिए हैं,
वें मेरी देह पर नहीं, मेरी आत्मा पर लगे है,
तुम्हारी वो गंदी नजरें,
और अनचाही छुअन,
आज तक भूल न सकी,
पसीने में तर, आज भी,
डर से कांपने लगती हूं,
तुम जानते थे कि ये गलत है,
तुम्हारी अंतरात्मा ने तुम्हें रोकने की तमाम कोशिशें भी की होंगी,
कहा होगा, कि ये एक छोटी बच्ची है,
इसके साथ ऐसा मत करो,
पर तुम न माने,
क्योंकि तुम जानते थे कि इसकी बात कोई नहीं मानेगा,
कितना डरती है ये अपने मां बाप से,
ओर उन्हें कहां फुर्सत की वें इसके बदलते व्यवहार पर सवाल करेंगे,
मैं डरपोक थी, सहम गई,
गलती तुम्हारी थी,
लेकिन आज तक सजा खुद को दे रही हुं,
तुम आज भी शान से घर आते हो,
रिश्तेदार जो ठहरे,
मेरे अपनों के लिए मेरी घुटन से ज्यादा तुम जरूरी हो,
पर मैं आज तक चुप हूं,
अंदर ही अंदर तिल तिल मरती हूं,
तुम्हें बददुआएं देती हूं,
पर कल मुझे मालूम हुआ कि तुम्हारे भी एक फूल से बेटी है,
भगवान न करें कोई चाचा, मामा, ताऊ या भाई बनकर उसके साथ वहीं दोहराए,
जो तुमने मेरे साथ किया,
और तुम्हें आगाह करती हूं कि अपने घर में किसी हैवान के लिए जगह मत रखना,
अपनी बेटी को इतना भी मत डराना
कि उसके व्यवहार में आए बड़े बदलाव भी तुम्हें मामूली ही लगें,
जब कभी उसके आंसू बहते दिखाई पड़े,
तो पूछ लेना,
कि उसे कोई परेशानी तो नहीं?
आखिरी सांस तक मेरी बददुआएं तुम्हारे साथ है,
पर तुम्हारी बच्ची के लिए मैं प्रार्थना करूंगी,
तुम बस उसे बचाएं रखना,
कभी दोस्त बनके,
कभी पिता बनके,
पर न मैंने तुम्हें माफ किया,
उस गलती के लिए,
न खुद को कर पाऊंगी,
चुप रहने के लिए,
सब कुछ अकेले सहने के लिए,
फिर भी तुम्हारी बेटी खुश रहे,
यहीं प्रार्थना करूंगी।
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