उसका जाना मुझे पूरी तरह खाली कर गया है, क्यों?
मैं भी यही चाहती थी न कि वो चला जाए तो अब ये खालीपन क्यों? ये मलाल क्यों? कि कभी उसे समझा नहीं, समझने की कोशिश नहीं की, काश एक मौका और मिल जाता, काश वो लौट ये सब सिर्फ अटैचमेंट है, कंफर्ट है या फिर कोई बोझ जिसे मैं ढोना चाहती हूं बजाय ये स्वीकारने के कभी मुझे उससे प्यार था ही नहीं और न जाने कब तक मैं उसके अच्छे होने का फायदा उठाने वाली थी, न जाने कब तक मैं उसे अकेलेपन से लड़ने के लिए और अकेला कर देने वाली थी?
क्या मुझे सच में कभी उससे प्यार था???
क्या मैने कभी भी दिल से माफी मांगी?
क्या मैंने कभी भी दिल से कोशिश की थी उसे रोकने की, पूरी ईमानदारी से?
जवाब है नहीं,
उससे प्यार होने के बावजूद मैंने कभी ईमानदारी नहीं दिखाई, कभी सच्ची परवाह की ही नहीं, कभी सच्चे मन से उसे रोका ही नहीं तो फिर उसके जाने का इतना दुख क्यों?
किस बात पर मैं खुद को ये कह रही हूं कि मैंने तो कोशिश की थी, कब की कोशिश???
उसका जाना जरूरी था, यही सही भी है, वो मेरे जैसे एक स्वार्थी और लालची इंसान के साथ सिर्फ परेशान ही होता, जिसे अपने सिवाय कुछ दिखाई ही नहीं देता।
आखिर क्यों रुकना चाहिए था उसे?
ऐसा क्या था मेरे पास उसे देने के लिए सिवाय बातों के???
उसे प्यार की जरूरत है और मुझे तो अपनी शिकायतों और कमियां निकालने से ही फुर्सत नहीं है।
प्यार क्या होता है ये कोई उससे सीखे, परवाह करना किसे कहते है ये भी उसे देखे तो समझे,
एक ईमानदार इंसान होना, अपनी जिंदगी और वक्त दोनों अपने प्यार पर निस्वार्थ भाव से लगाना कोई उससे सीखे,
अपने आप को स्वीकारना, अपनी भावनाओं को समझना, अच्छी बुरी दोनों तरह की भावनाओं के साथ अपनी कमियों को समझना और इंपरफेक्शन को स्वीकारना कोई उससे सीखे,
कुछ परेशानियां थी उसकी जो मैं कभी जान ही नहीं पाई, समझ ही नहीं पाई, जिनसे वो अकेले ही लड़ता रहा, मेरे होने के बावजूद उसे कभी मेरा होना महसूस ही नहीं हुआ,
और न मैंने कभी समझने की हिम्मत दिखाई,
क्योंकि मैं एक डरपोक और आलसी इंसान हूं।
मैं अपनी छोटी-छोटी उलझनों को इतना बड़ा बनाती रही कि कभी उसकी बड़ी से बड़ी तकलीफ भी मुझे दिखाई नहीं दी।
आज जब पछताती हूं तो खुद से पूछती हूं कि आखिर किस बात की सजा दे रही थी मैं उसे??
आखिर क्यों किया मैंने ऐसा?
क्या इतना जरूरी था मेरा उसे नजरंदाज करना?
ऐसी कौनसी खुशियां पा ली मैंने उससे दूर होकर सिवाय इस मलाल के काश वो दिन लौट आये।
क्योंकि अब उसका लौट आना बहुत मुश्किल लगता है, हर बार मेरी नासमझी ने सब कुछ इतना खराब कर दिया है कि अब मैं चाहूँ भी तो उसकी परछाई भी नहीं छू सकती।
मगर आज भी मैं सिर्फ अपने बारे में सोचूं तो खुद से नजरें नहीं मिला पाऊंगी।
सो अब उसकी खुशी के लिए उसे जाने देना ही सही होगा, उसे खुश रहने का पूरा हक है, उसे भी समझे जाने, सुने जाने का हक है और उसे अब ये महसूस करना भी चाहिए कि जितना प्यार उसने दिया, जितना सम्मान उसने दिया है वह उससे कई गुना ज्यादा प्यार किए जाने के लायक है।
हम दूसरों को वही दे सकते है जो हम है या हमारे पास है, उसने मुझे एक नई नजरिया दिया, प्यार दिया, सम्मान दिया, अपनापन दिया, सुरक्षा दी, संबल दिया और आज सबसे जरूरी चीज अपने सच को स्वीकारने की ताकत दी क्योोंकि वो एक सच्चा इंसान है जिसे दूसरों को नीचा दिखाकर बड़ा बनने के बजाय हर बुराई में भी एक अच्छाई देख लेने की आदत है।
हे ईश्वर मैं और मेरी प्रार्थनाएं उसकी तरह सच्ची तो नहीं मगर उसे इस दुनियां की सारी अच्छाई, खुशियां और प्यार मिलें।
मैं अपनी नकारात्मक ऊर्जा तक भी उस तक पहुंचने नहीं देना चाहती, इसलिए मैं चाहती हु कि वो हर माध्यम से मुझसे दूर हो जाए।
मैं एक घटिया, मौकापरस्त, अंहकारी, बेकार और आलसी इंसान हूं।
मेरे इरादे कभी नेक नहीं थे न ही मैंने अपनी जिंदगी में कभी मेहनत करने की कोशिश की है इसलिए किसी भी चीज और इंसान कभी कद्र ही नहीं सीख पाई
मुझे जैसे झूठे, कमजोर और आलसी इंसान को न उससे माफी मांगने हक है न ही उसे याद करने का, न कभी उससे कुछ मांगने या उसकी दया तक कि उम्मीद रखने का हक है।
मैं नहीं जानती कि मैं इसका पश्चाताप कैसे करूंगी लेकिन आज के बाद कभी खुद को या दूसरों को एक अच्छा इंसान होने का झूठा दिखावा नहीं करूंगी
मैं ये स्वीकार करूंगी मैं एक स्वार्थी और घटिया इंसान हूं।