वैसे तो हम बनारस आने के लिए निकले थे, मगर जब अहेतु की कृपा हो तो सब सहज हो मिल जाता है।
ये कहानी शुरू तो मेरे जन्म से हुई थी, लेकिन ये बात 2022 की है।
वैसे कई लोग है जो मुझे अपना दोस्त, साथी, शुभचिंतक मानते है, यहां बनारस में भी और वहां इंदौर में भी। मगर मेरे सबसे अच्छे साथी, मेरे बचपन के दोस्त और मेरी दुनिया मेरे पापा रहे है। बीते एक वर्ष में हमारा रिश्ता तो मजबूत हो गया लेकिन हमारी दोस्ती जरा कमजोर पड़ गई थी। जब आपका सबसे करीबी दोस्त रूठ जाए तो पीड़ा, प्रेम से अधिक गहरी होती है।
दो प्रेमियों के बिछड़ने पर जितनी पीड़ा होती है उससे कई गुना ज्यादा पीड़ा तब होती है जब आपका कोई प्रिय, आंखो के सामने होकर भी न हो, तन से उपस्थित हो किन्तु मन से कई खोया हुआ।
मेरे राघव जी से ये देखा न गया, कि उनकी ये नन्हीं भक्त अपने उस दोस्त को सबसे ज्यादा याद करती है, जिसके प्रेम में कभी-कभी वह अपने प्रभु तक को भूल जाती है।
"सो होई जेहि राम रखी राचा"
होना क्या था हम साथ साथ बनारस आए मगर हम साथ थे नहीं, अचानक खाना खाकर बाहर घूमने निकले तो मैंने बस यूंही कहा कि आपकी ट्रेन तो दो दिन बाद है तब तक अयोध्या हो आइए,
उन्होंने कहा कि हां बात तो सही है, एक काम करो तुम भी हमारे साथ चलो,
मैं न करते करते भी साथ चल दी,
जिस क्षण अयोध्या पहुंचे, उस शाम से लेकर अगली सुबह तक जैसे सारे गिले शिकवे भूल कर हम फिर दोस्त बन गए थे। हालांकि एक पिता और बेटी के बीच हुई पिछली अनबन की थोड़ी टीस हमें छूने कोशिश कर जरूर रही थी। पर अमन भैया कहते है न कि "सब रूठे बच्चों से लेकिन मैया रूठ नहीं पाई,"
और अपने दोस्त में मैंने हमेशा मां पहले देखी, बाद में वें मेरे पिता बने। शायद लोगों को उनका ज्यादा भावुक स्वभाव का होना और मुझे इतना सवेंदनशील बनाना कमजोरी लगता हो लेकिन मेरे पिता एक मजबूत और सच्चे हृदय वाले इंसान है। एक पुरुष को रो लेने और अपनी भावनाएं दिखाने के लिए जो हिम्मत चाहिए, वह उनके अंदर जैसे कूट कूट कर भरी है, हालांकि वें मुझसे ज्यादा जिद्दी और नाजुक दिल वाले इंसान है, यही सहजता उनकी अलग पहचान है।
कहीं किसी ने कहा है कि पुरुष जब विकसित हो जाता है वह स्त्री सी ममता और समर्पण सिख जाता है। मुझे गर्व अपने पिता पर, नहीं अपनी मां पर, अपने सबसे अच्छे दोस्त पर।
कभी-कभी उनसे शिकायतें भी करती हूं, लेकिन शिकायतें भी उन्हीं से की जाती है जिनसे हम बेहद प्यार करते हैं।
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