हम इतने झूठे और बेईमान है कि हमें अपने ही अंतर्मन की आवाज अपने कानों तक सुनाई नहीं देती,
हमारे पास वक्त ही नहीं है अकेले बैठकर अपना सामना करने के लिए, हम एक बहुत झूठी जिंदगी जिये जा रहे है, जिसे देखकर कोई अजनबी भी कह सकता है कि कितना दिखावा है, कितना झूठ हंसते है ये लोग, प्यार और सामंजस्य की सिर्फ दलीलें है, कोई आपसी प्यार या समझ नहीं, यहां तक कि इतने सालों से एक साथ एक ही मकान में रहने के बावजूद कोई एक दूसरे को ठीक से जानता तक नहीं,
हम कभी खुश थे ही नहीं, लेकिन हमने हमेशा खुश होने का झूठा दिखावा किया है, हमेशा एक नकली चेहरा पहने हम सब अपने आप से और अपने सच से भागते रहे है।
हम सब अच्छा बनना चाहते है सिर्फ दूसरों की नजरों में, सच में अच्छा बनने की हमने कभी कोशिश तक नहीं की,
हम ने हमेशा एक दूसरे को नीचा दिखाना सिखा, झूठ बोलकर अपने अहंकार को ऊंचा रहना सिखा बजाय दूसरों की भावनाओं और विचारों का सम्मान किए।
हम कहने को तो एक दूसरे का सहारा है लेकिन हमें ये कभी पता नहीं होता कि हमारे साथ बैठकर खाना खा रहा मुस्कुराता हुआ इंसान आज आत्महत्या करने के विचारों से अंदर ही अंदर लड़ रहा है। हम कभी खुश थे ही नहीं, हमने कभी चाहा ही नहीं कि हम कभी सच में खुश रहना सीख पाए क्योंकि हमें अपनी परेशानियां रोने और बेचारा बने रहने की गैर जरूरी आदत सी पड़ गई है।
हमें अपने जीने का मकसद तक नहीं पता,
कि आखिर हम जी क्यों रहे हैं?
किसके लिए ये तमाम झूठे और खोंखलें ठाकोसले निभाएं जा रहे है, आखिर कौन देख रहा है जिसे हम खुश करना चाहते है???
आखिर किसके लिए हम ये सब किए जा रहे है?????
जब किसी सच्चे इंसान से मेरा सामना हुआ तो मैं इतनी खुदगर्ज थी कि मैंने उसे भी अपनी तरह बनाना चाहा या फिर समझने से बचती रही कि कितना जरूरी है सच को जानना, उसे स्वीकारना, उसकी राह पर चलना, मैंने कोशिश भी करनी चाही अपने तमाम सीखें पाठों को भूलने की, जिनमें सिर्फ झूठ, बेइमानी, स्वार्थ और अहंकार था लेकिन इंसान की फितरत कहां बदलती है, न चाहते हुए भी एक मोड़ ऐसा आया जहां मेरे दिये छोटे छोटे घाव उस इंसान को पूरा तोड़ गये,
अब वो अपने सच के साथ है,
और मैं फिर वहीं उसी झूठी दुनिया में, झूठा मुस्कुराने लौट आई हूं।
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