मां तुम मेरे प्रेम या नफरत की नहीं, दया की पात्र हो,
पहले मैं तुमसे नफरत करती थी कि तुम मुझे कभी समझ नहीं पाई,
अब मैं तुम पर दया भाव रखती हूं कि तुम्हें भी किसी ने नहीं समझा,
मेरी शिकायत थी कि तुमने कभी मुझे प्रेम नहीं दिया,
अब मैं क्षमा प्रार्थी हूं कि तुम्हें कभी भी प्रेम नहीं मिला,
मैं चाहती थी कि तुम मेरे लिए लड़ो, मेरा सहारा बनो कमजोरी नहीं,
अब मैं जानती हूं कि तुम कमजोर नहीं थी, सिर्फ अकेली थी,
जिसके पास खुद कोई सहारा नहीं रहा,
तुम हमेशा शिकायतें करती रही हो,
खैर उन्हें भी कभी सुना नहीं गया,
तुम डरपोक नहीं थी, पर तुम में मुझ सा साहस भी कभी नहीं था,
मैं अगर तुम्हारी जगह होती तो, मैं अपनी बेटी को रोकने के बजाय पंख देती, उसे खुला आसमान देने के लिए दुनियां भर से लड़ जाती,
मगर तुमने हमेशा मेरे पंख कुतरे और चाहा कि मैं जमीन पर रहूं,
वहीं सहू जो तुमने सहा, वहीं करूं जो तुमने किया,
सीधे बैठना, कम ही बोलना,
सिर पर पल्लू, सबकी सेवा में रहना,
अच्छा मां हो सके तो,
अगले जन्म तुम मेरी बेटी बनना,
मैं दुनिया का सारा प्यार, सारा दुलार तुम्हारी झोली में रख दूंगी,
पर तुम्हें पतंग नहीं पंक्षी बनने दूंगी,
जिसकी डोर कोई नहीं पकड़ सके,
मैं तुम्हें खुला आसमान देने के लिए सारी दुनिया से भी लड़ जाऊंगी,
तुम्हें आज़ादी का मतलब तब समझ आएगा,
तब तुम मेरी दया की नहीं,
मेरे प्रेम की पात्र बनोगी मां।
- रैना
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