Thursday, October 23, 2025

रिश्ता

बाबा, कल किसी से कह रहे थे,
कि एकादशी बाद कोई लड़का मुझे देखने आने वाला है,
लड़का अभी CA की तैयारी कर रहा है?
क्या?
तैयारी कर रहा है?
तो तैयारी करें, यहां क्यों आ रहा है भला।
खैर,
मन में बहुत सी उलझने है, 
बेचैनी भी,
बहुत सी अनकही बातें भी है जो कभी कहीं न जा सकेंगी,
अगर कह पाती तो मैं कहती शायद,
बाबा,
एक उम्र बीता दी मैंने आपकी अच्छी बेटी बनने में,
मगर बन न सकीं।
एक उम्र बीता दी एक जिम्मेदार बहन बनने में मगर अंततः बन न सकीं।
एक पूरी उम्र लगाई मैंने अपनी दादी की अच्छी पोती बनने में मगर बन न सकीं।
मगर क्यों?
शायद इसलिए कि मेरी अच्छी की परिभाषा कुछ ओर थी और उनकी कुछ ओर,
या शायद यहां कितना भी कुछ कर लिया जाए, 
एक गलती सारी अच्छी बातें भुला ही देती है।
हो सकता है मैं एक उम्र बीता दूं, 
अच्छी पत्नी, अच्छी बहु बनने में, 
मगर बन न सकूं,
हो सकता है कि मां की तरह मुझे भी अंततः यही सुनने मिलें,
मगर मैं बस इतना जानना चाहती हूं कि इस बेटी से बहु तक के सफर के बीच क्या मैं अपनी ही जिंदगी से थोड़ा वक्त मैं बनने के लिए ले सकती हूं??
जिसे सिर्फ मैं, मेरी अंतरात्मा जानती है,
जो मैं वाकई में हमेशा से बनना चाहती थी,
क्या मुझे अपनी ही जिंदगी से थोड़ा वक्त मिल सकता है?
अपने आप को चुनने के लिए,
जानती हूं आपके सामने समाज और समाज के हजारों सवाल खड़े होंगे,
मगर क्या मेरे अस्तित्व को मारकर, 
मेरी आत्मा की हत्या कर,
समाज की इस नियमावली को मानना जरूरी है?
मैं कह पाती तो कहती, 
कि नहीं देख सकती मैं खुद को ऐसे,
जैसे अपनी मां को देखती हूं,
हर दिन अपना मन मारकर,
अपमानित होकर जीते हुए,
इससे पहले कि मुझे भी इस गुलामी का हिस्सा बनाया जाए,
मैं जी लेना चाहती हूं,
सांस लेना चाहती हूं,
खुद को ढूंढना चाहती हूं,
कि आखिर जब मैं एक बेटी, एक पत्नी और एक बहु नहीं हूं, तब मैं कौन हूं???
मेरी अपनी कोई मौलिक सोच है भी या नहीं ?
अगर मैं अपनी मां कि तरह खुद को नहीं देखना चाहती तो फिर मैं खुद को कैसे देखती हूं?
आखिर मैं क्या चाहती हूं???


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