वो गालियां याद आती है,
वो अस्सी घाट की सुबहें,
वो तुलसी घाट की शामें,
वो एकटक देखना उसको,
उसी को मां समझना फिर,
उसी से दोस्ती करना,
वो गंगा का किनारा था,
कि जिससे गुफ्तगू करना,
कि वो जो मां सी ममता थी,
गंगा आरती में, मां की लहरों में,
वो एक कठपुतली वाले दादा थे,
जो संग में चाय पीते थे,
कभी किस्से सुनाते थे,
कभी बातें बताते थे,
कि मेरा दिल नहीं लगता,
वो गालियां याद आती है।
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