सुना हैं बस घर आंगन,
तन पर मेघा बरसी हैं पर,
सुखा है ये मन प्रांगण,
मोह के पंछी सारे उड़ गए,
बचा रहा बस मेरा मन,
मैने किया हैं आज समर्पित,
अपनी कलम को ये जीवन,
हालांकि मेरी भी शिकायतें हैं तुमसे, एक अरसा हुआ तुम घर नहीं लौटी, जो गर तुम आ जाती तो मैं तुम्हें बताता, कि मैं भी एक पिता होने से पहले एक इ...
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