किसी हत्या पर, या बलात्कार होने के बाद,
जब हर जगह हंगामा होता है,
लोग चीख चीख कर न्याय की गुहार लगाते हैं,
तब मैं कहा रहती हुं,
क्यों कुछ नहीं कहती,
जबकि ये हुनर, या बेबसी मुझे लिखने को कहती है,
सबसे ज्यादा लोकप्रिय कवि या लेखक वही बनते है न, जो हर हादसे पर कविता कर दे,
मुझ जैसे कमजोर दिल लोग कहां छिप जाते है, ऐसे समय पर,
जो हर घड़ी, हर समय, भावनाओं में जीते है,
जिन्हें दुनिया से ज्यादा लोगों की परवाह रहती है,
राजनीति से ज्यादा आम जनता की फिक्र होती है,
बेबस बेसहारा लोगों को देखते ही जिनका दिल पूछने लगता है कि
"ये दुनिया मिल भी जाए तो क्या हो???"
हम जैसे लोग क्यों मौके का फायदा नहीं उठाते, ऐसे हादसों से हम सन्न क्यों रह जाते है,
जबकि हमें तो खुद से ज्यादा उन उदास चेहरों की परवाह है, जो अकेले है, परेशान है,
क्योंकि हम जानते है अकेले रह जाने का दर्द,
तो फिर क्यों नहीं लिखती मैं, या मेरे जैसे लोग???
कमजोर दिल वाले लोग.....
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